शाकाहारी क्यों बने
हम विभिन्न योनियो के बारे में पहले ही बात कर चुके है. आइये हम कुछ बातों को ध्यान पूर्वक देखे.
१. कुछ लोग यह तर्क देते है की वो तो सिर्फ मॉस खाते है जानवर को मारता तो कोई और है और अगर वो उसे नही खायेंगे तो और कोई खा लेगा. यह बात सही नही है क्योंकि उनके खाने के लिए ही किसी और ने जीव हत्या की है और उसका दोष तो बल्कि कम है क्योंकि उसने यह सब अपना पेट पालने के लिए किया है. मगर वो भी दोषमुक्त नही माना जा सकता क्योंकि वो भी पेट पालने के लिए कुछ और कार्य कर सकता था. इसलिए दोनों ही दोषी है.
२. कुछ लोग कहते है की वो तो जानवर को मारकर उसको भोग योनी से छुटकारा दिलवाते है. वो यह नही जानते की वो जानवर को मारकर कितना बड़ा पाप कर रहे है. मरने वाला जानवर तो अपने बुरे कर्मो का भोग भोगने के लिए आया था मगर उसको मारने वाले और खाने वाले ने उसे अपने कर्मो का भोग भोगने नही दिया. अब उस जानवर के बचे हुए बुरे कर्म उनसब लोगो के खाते में जुड़ जाते है जो उसको मारने और पकाने और खाने के प्रकिर्या में शामिल होते है. अब वो जानवर तो उन कर्मो से छुटकारा पा जाता है और वो सब उन कर्मो को भोगते है.
३. कई लोग यह कहते है की उनके धर्म में जीव हत्या मना नही है मगर जीव हत्या किसी धर्म में माननीय भी नही है. जीव हत्या करके पेट भरना कुछ धर्मो में सिर्फ तभी माननीय है जब कुछ और खाने को ना मिल रहा हो और अपना जीवन बचाना हो.
४. कुछ लोगो का तर्क है की पेड़ पौधों में भी तो जीवन होता है. हाँ यह सही है की उनमे जीवन होता है मगर उनके अंदर जीवन को समझने की शक्ति बहुत कम होती है तथा वैसे भी छोटे पौधे और कच्चे फल सब्जिय तोडनी गलत मानी जाती है. जैन धर्म में तो जमीन के नीचे उगने वाली सब्जिया खाने को कहा जाता है और वो भी वोही जो की पककर जमीन से बाहर आ जाये जैसे आलू आदि.
५. कुछ लोग कहते है की अगर हम नही मारेगे तो सारी दुनिया में जानवर ही पैदा हो जायेगे . यह सोच गलत है क्योंकि किसी की जनसंख्या कम करना प्रकृति का कार्य है. अब जैसे की बीमारी फैलती है और लाखो मुर्गे मर जाते है और वैसे भी मांसाहारी जानवर अपनी भोग योनी में दुसरे जानवर को मारकर उनकी जनसंख्या कंट्रोल करते है.
६. अगर वैसे भी देखा जाये तो मरे हुए जानवर का मॉस भी मुलायम होता है और इन्सान के पेट की अंतडिया भी मुलायम होती है और मॉस को पचाने की प्रकिर्या में जब दोनों आपस में रगड़ खाते है तो पेट में घर्षण (FRICTION) से जख्म होने का खतरा बना रहता है. जब की हरी सब्जियों के बारीक रोंए (बाल) होते है जो की पचाने के समय ब्रुश की तरह काम करते है और हमारे पेट की सफाई करते है.
७. शारीरिक द्धृष्टि से भी देखा जाये तो मांसाहारी जानवर की आंते बहुत बड़ी और लम्बी होती है जबकि शाकाहारी जानवर और इन्सान की आंते छोटी होती है जो इस बात का संकेत करती है की इन्सान का शरीर शाकाहारी भोजन के लिए ही बना है.
उपर लिखी बातों का विचार करके ही मै शाकाहारी हूँ.
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