शाकाहारी क्यों बने
हम विभिन्न योनियो के बारे में पहले ही बात कर चुके है. आइये हम कुछ बातों को ध्यान पूर्वक देखे.
१. कुछ लोग यह तर्क देते है की वो तो सिर्फ मॉस खाते है जानवर को मारता तो कोई और है और अगर वो उसे नही खायेंगे तो और कोई खा लेगा. यह बात सही नही है क्योंकि उनके खाने के लिए ही किसी और ने जीव हत्या की है और उसका दोष तो बल्कि कम है क्योंकि उसने यह सब अपना पेट पालने के लिए किया है. मगर वो भी दोषमुक्त नही माना जा सकता क्योंकि वो भी पेट पालने के लिए कुछ और कार्य कर सकता था. इसलिए दोनों ही दोषी है.
२. कुछ लोग कहते है की वो तो जानवर को मारकर उसको भोग योनी से छुटकारा दिलवाते है. वो यह नही जानते की वो जानवर को मारकर कितना बड़ा पाप कर रहे है. मरने वाला जानवर तो अपने बुरे कर्मो का भोग भोगने के लिए आया था मगर उसको मारने वाले और खाने वाले ने उसे अपने कर्मो का भोग भोगने नही दिया. अब उस जानवर के बचे हुए बुरे कर्म उनसब लोगो के खाते में जुड़ जाते है जो उसको मारने और पकाने और खाने के प्रकिर्या में शामिल होते है. अब वो जानवर तो उन कर्मो से छुटकारा पा जाता है और वो सब उन कर्मो को भोगते है.
३. कई लोग यह कहते है की उनके धर्म में जीव हत्या मना नही है मगर जीव हत्या किसी धर्म में माननीय भी नही है. जीव हत्या करके पेट भरना कुछ धर्मो में सिर्फ तभी माननीय है जब कुछ और खाने को ना मिल रहा हो और अपना जीवन बचाना हो.
४. कुछ लोगो का तर्क है की पेड़ पौधों में भी तो जीवन होता है. हाँ यह सही है की उनमे जीवन होता है मगर उनके अंदर जीवन को समझने की शक्ति बहुत कम होती है तथा वैसे भी छोटे पौधे और कच्चे फल सब्जिय तोडनी गलत मानी जाती है. जैन धर्म में तो जमीन के नीचे उगने वाली सब्जिया खाने को कहा जाता है और वो भी वोही जो की पककर जमीन से बाहर आ जाये जैसे आलू आदि.
५. कुछ लोग कहते है की अगर हम नही मारेगे तो सारी दुनिया में जानवर ही पैदा हो जायेगे . यह सोच गलत है क्योंकि किसी की जनसंख्या कम करना प्रकृति का कार्य है. अब जैसे की बीमारी फैलती है और लाखो मुर्गे मर जाते है और वैसे भी मांसाहारी जानवर अपनी भोग योनी में दुसरे जानवर को मारकर उनकी जनसंख्या कंट्रोल करते है.
६. अगर वैसे भी देखा जाये तो मरे हुए जानवर का मॉस भी मुलायम होता है और इन्सान के पेट की अंतडिया भी मुलायम होती है और मॉस को पचाने की प्रकिर्या में जब दोनों आपस में रगड़ खाते है तो पेट में घर्षण (FRICTION) से जख्म होने का खतरा बना रहता है. जब की हरी सब्जियों के बारीक रोंए (बाल) होते है जो की पचाने के समय ब्रुश की तरह काम करते है और हमारे पेट की सफाई करते है.
७. शारीरिक द्धृष्टि से भी देखा जाये तो मांसाहारी जानवर की आंते बहुत बड़ी और लम्बी होती है जबकि शाकाहारी जानवर और इन्सान की आंते छोटी होती है जो इस बात का संकेत करती है की इन्सान का शरीर शाकाहारी भोजन के लिए ही बना है.
उपर लिखी बातों का विचार करके ही मै शाकाहारी हूँ.
Sunday, September 19, 2010
Saturday, September 18, 2010
औरते बात छुपा क्यों नही पाती
औरते बात छुपा क्यों नही पाती.
यह महाभारत काल की बात है. वासुदेव (भगवान श्री कृष्ण के पिता) की बहन का नाम पृथा था उन्हें राजा कुंती भोज ने गोद ले लिया और उनका नाम कुंती रख दिया. एक बार ऋषि दुर्वासा ने कुंती को एक मन्त्र की शिक्षा दी जिसकी शक्ति से वो किसी भी देवता को बुला सकती थी और उनसे सन्तान प्राप्ति कर सकती थी. उत्सुकतावश कुंती ने सूर्य देव को बुला लिया और मन्त्र के फलस्वरूप उनसे उसे पुत्र की प्राप्ति हुई. उस पुत्र को उन्होंने नदी में बहा दिया क्योंकि तब तक वो क्वांरी थी. वो बालक बहता हुआ एक व्यक्ति को मिला जो की हस्तिनापुर के राजा के यहाँ सेवक के रूप में कार्य करता था. बड़ा होकर जब उस बालक ने गुरु द्रोणाचार्य से शस्त्र चालन की शिक्षा लेनी चाही तो उन्होंने यह कहकर न करदी की वो बालक क्षत्रिय पुत्र नही था. तब उस बालक ने गुरु परशु राम से शस्त्रों की शिक्षा ली. वो बालक जिसका नाम कर्ण प्रसिद्ध हुआ आगे चलकर हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योदन का परम मित्र बन गया.
दूसरी तरफ कर्ण को पानी में बहाने के कुछ समय बाद कुंती की शादी उसवक्त के हस्तिनापुर के राजकुमार पांडु के साथ हो गयी. पांडु की एक और पत्नी भी थी. एक बार जब पांडु जंगल में शिकार खेलने गए तो गलती से उन्होंने एक ऋषि को जो की अपनी पत्नी के साथ प्रेमलीला में मग्न था उनको तीर मार दिया. गुस्से में ऋषि ने पांडु को श्राप दे दिया की वो जब भी अपनी पत्नियो के पास प्रेमपूर्वक जायेंगे तब ही उनकी मृत्यु हो जाएगी. तब कुंती ने ऋषि दुर्वासा द्वारा बताये मन्त्र की सहायता से धर्मदेव से युधिष्ठर, वायु देव से भीम और इंद्र देव से अर्जुन को प्राप्त किया. पांडु की दूसरी पत्नी ने उसी मन्त्र की सहायता से अश्वनी देव से नकुल और सहदेव को प्राप्त किया. पांडु के ये पांचो पुत्र ही पांडव कहलाये. और एक बार जब प्रेमवश पांडु ने अपनी पत्नी के पास जाने की कोशिश की तो उनकी मृत्यु हो गयी.
आगे चलकर जब महाभारत का युद्ध हुआ तो कर्ण कौरवो की तरफ से लड़ा. जब कर्ण और अर्जुन के बीच में निर्णणायक युद्ध होना था तब उस युद्ध से पहले कुंती ने अकेले में कर्ण को यह भेद बता दिया. इसके बावजूद वो पांड्वो की तरफ न जाकर कौरवो की तरफ से ही लड़ता रहा मगर वो मोह वश मौका मिलने पर भी अर्जुन को नही मार सका और अंत में अर्जुन ने उसे मार दिया. बाद में जब कर्ण के अंतिम संस्कार के लिए विवाद हुआ तो कुंती ने यह भेद पांड्वो के सामने खोल दिया. यह जानकर अर्जुन को कर्ण को मारने का बहुत पश्चाताप हुआ और उसने गुस्से में कुंती को श्राप दिया की अब किसी औरत के पेट में कभी कोई बात नही पचेगी. और उस दिन के बाद से औरतो के पेट में कोई बात नही पचती.
यह महाभारत काल की बात है. वासुदेव (भगवान श्री कृष्ण के पिता) की बहन का नाम पृथा था उन्हें राजा कुंती भोज ने गोद ले लिया और उनका नाम कुंती रख दिया. एक बार ऋषि दुर्वासा ने कुंती को एक मन्त्र की शिक्षा दी जिसकी शक्ति से वो किसी भी देवता को बुला सकती थी और उनसे सन्तान प्राप्ति कर सकती थी. उत्सुकतावश कुंती ने सूर्य देव को बुला लिया और मन्त्र के फलस्वरूप उनसे उसे पुत्र की प्राप्ति हुई. उस पुत्र को उन्होंने नदी में बहा दिया क्योंकि तब तक वो क्वांरी थी. वो बालक बहता हुआ एक व्यक्ति को मिला जो की हस्तिनापुर के राजा के यहाँ सेवक के रूप में कार्य करता था. बड़ा होकर जब उस बालक ने गुरु द्रोणाचार्य से शस्त्र चालन की शिक्षा लेनी चाही तो उन्होंने यह कहकर न करदी की वो बालक क्षत्रिय पुत्र नही था. तब उस बालक ने गुरु परशु राम से शस्त्रों की शिक्षा ली. वो बालक जिसका नाम कर्ण प्रसिद्ध हुआ आगे चलकर हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योदन का परम मित्र बन गया.
दूसरी तरफ कर्ण को पानी में बहाने के कुछ समय बाद कुंती की शादी उसवक्त के हस्तिनापुर के राजकुमार पांडु के साथ हो गयी. पांडु की एक और पत्नी भी थी. एक बार जब पांडु जंगल में शिकार खेलने गए तो गलती से उन्होंने एक ऋषि को जो की अपनी पत्नी के साथ प्रेमलीला में मग्न था उनको तीर मार दिया. गुस्से में ऋषि ने पांडु को श्राप दे दिया की वो जब भी अपनी पत्नियो के पास प्रेमपूर्वक जायेंगे तब ही उनकी मृत्यु हो जाएगी. तब कुंती ने ऋषि दुर्वासा द्वारा बताये मन्त्र की सहायता से धर्मदेव से युधिष्ठर, वायु देव से भीम और इंद्र देव से अर्जुन को प्राप्त किया. पांडु की दूसरी पत्नी ने उसी मन्त्र की सहायता से अश्वनी देव से नकुल और सहदेव को प्राप्त किया. पांडु के ये पांचो पुत्र ही पांडव कहलाये. और एक बार जब प्रेमवश पांडु ने अपनी पत्नी के पास जाने की कोशिश की तो उनकी मृत्यु हो गयी.
आगे चलकर जब महाभारत का युद्ध हुआ तो कर्ण कौरवो की तरफ से लड़ा. जब कर्ण और अर्जुन के बीच में निर्णणायक युद्ध होना था तब उस युद्ध से पहले कुंती ने अकेले में कर्ण को यह भेद बता दिया. इसके बावजूद वो पांड्वो की तरफ न जाकर कौरवो की तरफ से ही लड़ता रहा मगर वो मोह वश मौका मिलने पर भी अर्जुन को नही मार सका और अंत में अर्जुन ने उसे मार दिया. बाद में जब कर्ण के अंतिम संस्कार के लिए विवाद हुआ तो कुंती ने यह भेद पांड्वो के सामने खोल दिया. यह जानकर अर्जुन को कर्ण को मारने का बहुत पश्चाताप हुआ और उसने गुस्से में कुंती को श्राप दिया की अब किसी औरत के पेट में कभी कोई बात नही पचेगी. और उस दिन के बाद से औरतो के पेट में कोई बात नही पचती.
Friday, September 10, 2010
मै भगवान शिव को परमात्मा क्यों मानता हूँ
यह आम धारणा है कि परमात्मा एक है और वह ही सृष्टि चलाता है. उन्हें परमात्मा कहा जाता है क्योंकि वो परम आत्मा है. हमारे शरीर में तीन तरह कि शक्तिया काम करती है. पहली है जड़ शरीर जो कि पञ्च भूत यानि कि आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा मिटटी का बना होता है. हमारा मानव शरीर भी इन पञ्च भूत का बना हुआ है. दूसरी शक्ति इस में रहती है वो है जीव आत्मा. यह आत्मा का ही एक अंश है जो कि माया से लिपटा रहता है तथा यह ही जड़ शरीर का भोग करता है, कर्म करता है और उसके फल पाता है. तीसरी शक्ति है आत्मा जो कि परमात्मा का ही अंश है तथा जो कि देखता रहता है कि जीवात्मा जिसे शरीर दिया गया है वो इसका उपयोग कैसे कर रहा है.
यह तीसरी शक्ति सिर्फ मानव शरीर में पाई जाती है कयोंकि सिर्फ मानव योनी कर्म योनी है बाकि त्रियोस्करता (तिरछा चलने वाला यानि कि पशु पक्षी) तथा जंगम (यानि पेड़ पोधे ) भोग योनी मानी जाती है जिसे कर्म का अधिकार नही है. वो सिर्फ अपने पूर्व जन्मो के कर्मो का फल भुगत सकते है. जैसे कि बिल्ली गाय का दूध नही निकाल सकती मगर सिर्फ पी सकती है. उसी तरह पेड़ पोधे स्वयं खाद नही ले सकते क्योंकि उनकी भोग योनी है. मानव को भगवान ने ये जिमेदारी दी है कि वो भगवान के बताये मार्ग पर चलकर प्रकृति कि व्यवस्था करे. वो बात अलग है कि आज का मानव बजाये प्रकृति से सहयोग करने के उसको जीतने कि कोशिश कर रहा है.
मानव शरीर के अंदर जीव आत्मा और आत्मा दोनों एक साथ शरीर में रहती है मगर अज्ञान तथा माया कि वजह से जीव आत्मा को आत्मा से निकटता महसूस नही होती और वो शरीर के भोग में फंसी रहती है. जब जीव् को आत्मा से निकटता का एहसास हो जाता है तब वो परमात्मा को पहचान कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है. आत्मा से निकटता ही परमात्मा को पाने का रास्ता है. परमात्मा को जानने से पहले हमे सृष्टि कि रचना समझनी होगी. सबसे उपर परमात्मा है फिर त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र है. इनमे से भगवान रूद्र का रूप परमात्मा शिव से बिलकुल मिलता है. इसके बाद सभी देवी देवता आते है जो कि सृष्टि को चलाने में मदद करते है. इन तीनो भगवान जो कि परमात्मा का ही रूप है इनमे से भगवान ब्रह्मा का कार्य सृष्टि कि रचना है, भगवान विष्णु का कार्य सृष्टि का संचालन है तथा भगवान रूद्र का कार्य अंत में सृष्टि का संहार करके उसे परमात्मा में विलीन करने का है. अब हम अपने प्रश्न पर आते है कि "शिव को ही परमात्मा क्यों माना जाये" तो उसके लिए निम्न लिखित कारण है:
१. भगवान ब्रह्माजी का कार्य सृष्टि की रचना है तथा पौराणिक पुस्तको में ब्रह्मा जी के दो रूप बताये गए है एक -अपर ब्रह्मा और दुसरे पर ब्रह्मा. अपर ब्रह्मा सृष्टि को बनाते है और उसके कण कण में व्याप्त है और पर ब्रह्मा उनसे भी परे है. भगवान ब्रह्मा को आमतौर पर ब्राह्मणों, ऋषि मुनियों का अराध्य माना जाता है. अगर भगवान ब्रह्मा ही परमात्मा होते तो दोनों नामो का भेद करने की कोई जरूरत नही थी तथा यह संकेत देता है भगवान ब्रह्मा ने परमात्मा की प्रेरणा से यह सृष्टि बनाई है.
२. भगवान विष्णुजी को सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी दी गयी है और ऐसा माना जाता है की वो देवताओ के अराध्य है और भगवान रूद्र जो की परमात्मा शिव से बिलकुल मिलते जुलते है उन्हें महादेव भी कहा जाता है वो सब के द्वारा पूज्य है चाहे वो देवता हो, मनुष्य हो, असुर हो या दैत्य आदि हो.
३. सृष्टि के संहार का जिम्मा भगवान रूद्र को दिया गया है जो की सबसे मुश्किल कार्य है कि कब सृष्टि चलने लायक नहीं है और उसका अंत होना चाहिये. ऐसा समझा जाता है भगवान रूद्र परमात्मा शिव की कापी है और वो ही परमात्मा शिव के बारे में जानते है (शिव महापुराण). किसी भी चीज को समाप्त करने का फैसला सिर्फ उसका मालिक ही कर सकता है. मगर इसका मतलब ये नहीं है की भगवान ब्रह्मा, विष्णु या रूद्र में कोई छोटा बड़ा है. ऐसा भेद भाव करना भी पाप है और उसके लिए परमात्मा शिव कभी माफ़ नही करते. इसीलिए विभिन्न कल्पो में ये तीनो भगवान एक दुसरे में प्रगट होते है.
४. परमात्मा शिव निराकार और साकार रूप यानि भगवान रूद्र के रूप में साकार रूप में और शिवलिंग के रूप में निराकार रूप में पूजे जाते है. वो निर्विकार भी है कयोंकि उनका किसी योनी विशेष से लगाव या दुर्भाव नही है. वो एक पिता की तरह अपने सब बच्चो से एक सा प्यार करते है और जो भी उनकी पूजा करता है उससे वो प्रसन्न होते है. वो निर्गुण भी है क्योंकि तीनो गुंणों वाले उनकी पूजा करते है जैसे की सात्विक फल, फूल आदि से उनकी पूजा होती है, राजसी मिठाई और पकवान आदि से उनकी पूजा होती है और तामसिक भांग आदि भी उनको अर्पण की जाती है. यानि की तीनो गुंणों के पदार्थ उनकी पूजा के लिए तीनो प्रकृति के लोग अर्पित करके उनकी पूजा कर सकते है. इसलिए वो निराकार , निर्गुण और निर्विकार माने जाते है.
५. परमात्मा शिव भगवान रूद्र रूप में श्मशान में भी उपस्थित रहते है. यह इस बात का संकेत है की परमात्मा शिव के लिए दुनिया के लिए कोई आकर्षण नही है कयोंकि यह सब चीजे उनके कहने पर ही बनाई गयी है ठीक वैसे , जैसे हलवाई को मिठाई का कोई आकर्षण नही होता. उन्होंने सारे शरीर पर भस्म लगाई होती है जो इस बात को बताती है की जीवन का आखरी सत्य मौत है और यह सुंदर जड़ शरीर आखिर राख बन जाना है. इसलिए अपने अंत को याद करके इन्सान को कोई बुरा काम नही करना चाहिये. वैसे भी मरने के बाद आत्मा परमात्मा के पास जाकर जीवात्मा के कर्मो का लेखा जोखा देती है. भगवान रूद्र की श्मशान में उपस्थिति इस बात का संकेत है की मरने के बाद इस सूक्ष्म शरीर के मालिक परमात्मा शिव है. वैसे भी शिव का मतलब है मंगल यानि की भगवान रूद्र की उपस्थिति इस बात का प्रतीक है की श्मशान जैसी जगह भी भगवान को अपवित्र नही कर सकती.
वैसे भी भस्म हिन्दू धर्म में बहुत पवित्र मानी जाती है. भस्म हवन के बाद बचने वाली ज्वलित अवशेषों को भी कहते है और यह अग्नि और सोम(घी) के मिलन से बनती है. हिन्दू धर्म में ये माना जाता है की सम्पूर्ण सृष्टि अग्निशोमात्मक रूप में विद्यमान में है. इसका मतलब सम्पूर्ण पदार्थ अग्नि (तेज) और सोम यानि रस( तरल) के मिलन से बनते है. अग्नि का मतलब है परमात्मा शिव और सोम का मतलब है उनकी पराशक्ति देवी शिवा. भस्म को शिव यानि अग्नि का वीर्य कहा जाता है. कुछ लोग कह सकते है की पानी और अग्नि (तेज) तो एक दूसरे के बिलकुल विपरीत है. यह बात सही नहीं है क्योंकि अब तो आजकल के विज्ञानिक भी मानते है की जल से बिजली यानि तेज उत्पन्न किया जा सकता है. यानि की ये दोनों एक दुसरे से अभिन्न है. इसीलिये सिर्फ सोम(देवी शिवा) ही अपने पानी के रूप में अग्नि (परमात्मा शिव) को शांत कर सकता है और घी के रूप में उसे भड़का सकता है.
६. भगवान रूद्र के गले में पड़ा सांप इस बात को बताता है की इन्सान की इन्द्रिया सांप की तरह है जिनको अगर वश में रखा जाये तो ज्ञान देती है और रक्षा करती है और अगर खुला छोड़ दिया जाये तो सांप की तरह जीवन में जहर घोल देती है. इस लिए इन्सान को अपनी इन्द्रियों पर वश रखना चहिये.
७. परमात्मा शिव को देवादिदेव महादेव कहा जाता है क्योंकि वो देवताओ के भी देवता है और उन्हें वर देने और कार्य करने की शक्ति प्रदान करते है इसलिए वो ही परमात्मा है.
८. परमात्मा शिव का एक रूप पशुपति नाथ का भी है. इसको समझने से पहले समझना होगा की पशु कौन है. हर वो प्राणी जो चेतन है वो पशु है चाहे वो मनुष्य हो, देवता हो, पेड़ हो, पोधे हो, यानि देवताओ से लेकर और सूक्ष्मतर प्राणी तक हर जीव पशु है जो की पाशो यानि विकारो से बंधा हुआ है. यह विकार या पाश जीव के अंदर अहंकार को जन्म देते है. वो अहंकार जीव को अपने असली स्वरूप यानि परमात्मा के अंश आत्मा से अलग होकर एक अलग पहचान होने का भ्रम पैदा करता है. इसी भ्रम के अधीन जीव को जड़ शरीर से लगाव पैदा होता है. भोग योनी के जीव सिर्फ वो ज्ञान रखते है जो उन्हें भोगना होता है. जबकि कर्म योनी यानि मनुष्य जन्म से थोडा ज्ञान और थोड़े संस्कार और थोडा प्रारब्द लेकर पैदा होता है. जैसे के जन्म के समय से ही उसे ज्ञात होता है की भूख लगने पर उसे रोना है हसना नही. इसी तरह कोई बच्चा थोड़ी भूख लगने पर ही चिल्लाने लगता है और कोई शांत स्वभाव का होता है. यह उसके संस्कार है. किसी की माता दयालु होती है और कोई नौकरानी को सौंप दिया जाता है ये प्रारब्ध है. इन तीनो में से ज्ञान तो कुछ खुद बडाना पड़ता है और कुछ इन्द्रियों के क्षमता बड़ने से बड़ता है. बाकि दोनों साथ ही चलते है तथा क्रियमण कर्मो से भी प्रभावित होते है. ये पाश जीव पर माया के जरिये डाले जाते है.
तो इस तरह हर जीव पाशो से बंधा पशु है और जब भी कोई वस्तु होती है तो उसका कोई पति यानि मालिक होता है और वो पति यानि परमात्मा शिव ही पशुपति नाथ यानि की सब पशुओ के मालिक कहलाते है और उनका इस नाम से बहुत प्रसिद्ध मन्दिर पशुपति नाथ मन्दिर नेपाल में स्थित है. परमात्मा शिव ही सब पशुओ यानि जीवो के मालिक है और वो अपनी पराशक्ति यानि माया यानि जगत्जननी यानि प्रकृति यानि देवी शिवा के जरिये इस सृष्टि के कार्य करते है. शिव और शक्ति एक है और उन्हें अलग करके नही देखा जा सकता इसलिए परमात्मा शिव को अर्धनारीश्वर रूप में भी पूजा जाता है.
९. ये माना जाता है कि इस कल्प में जब परमात्मा ने सृष्टि रचना का सोचा तो नीर यानि पानी में से भगवान विष्णु, कमल के फूल की नाल में से भगवान ब्रह्मा तथा उनकी भौंह में से भगवान रूद्र जो कि परमात्मा शिव का साकार प्रतिरूप है वो पैदा हुए. अलग अलग कल्प में परमात्मा के ये तीनो रुपी भगवान अलग अलग तरह से उत्पन्न होते है मगर ये जन्म तो लेते है. मगर परमात्मा शिव का कहीं पैदा होने का कोई उल्लेख नही मिलता. इसलीये परमात्मा शिव अजन्मे माने गए है और वो ही परमात्मा है.
१०. 'सत्यम शिवम सुन्दरम' इस श्लोक से हर हिन्दू वाकिफ है. इसका मतलब है सृष्टि का पहला और अंतिम सत्य परमात्मा शिव है वैसे भी शिव का मतलब है मंगल. इसलिए सृष्टि की शुरआत परमात्मा शिव से होती है और अंत में सब कुछ उनमे विलीन हो जाता है. भगवान ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र उनके तीन साकार रूप है. उसके बाद, देवता, गंधर्व, मनुष्य, स्थावर तथा जंगम इत्यादि योनिया. इसीलिये कहते है कि संसार में सिर्फ सत्य और शिव सुंदर है.
११. हालाँकि परमात्मा शिव को हजार से अधिक नमो से पुकारा जाता है उनमे से ८ मुख्य है : शिव, महेश्वर, रूद्र, ब्रह्मा, विष्णु, सर्ववैद्य, सर्वज्ञ, परमात्मा. क्योंकि परमात्मा शिव की शक्ति माया है और वो उसके पति है यानि माया के भी इश्वर है इसलिए उन्हें महेश्वर कहा जाता है. उन्हें सर्ववैध भी कहा जाता है क्योंकि वो इस सृष्टि की हर बात से वाकिफ है और वो ही इस सृष्टि के सभी रोग दूर करने में समर्थ है. उन्हें सर्वज्ञ कहा गया है क्योंकि वो हर जगह मौजूद है.
१२. उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है क्योंकि सागर मंथन के समय उन्होंने सृष्टि को बचाने के लिए विष को अपने गले में रख लिया था. इससे हमे ये संकेत मिलता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ा तो उसके मालिक ने उसे बचाने के लिए विष भी पी लिया और इसी तरह मानवता कि रक्षा के लिए इन्सान को विष पीने से भी नही घबराना चाहिये.
१३. जब भी सृष्टि कि विभिन्न योनियों में मतभेद होते है और उनका फैसला नही हो पाता तो वो अंत में परमात्मा शिव के पास जाते है और उनका फैसला ही अंतिम फैसला माना जाता है. यह स्पष्ट करता है कि वो ही परमात्मा है.
१४. जीवन का सत्य है दुःख. जीव अपने कर्मो से और उसके भोग से सदा दुखी रहता है. सुख भोगते हुए भी उन सुखो के खो जाने के भय से वो दुखी रहता है. जीवन के इस रुदन को जो दूर कर सके वो रूद्र है. महा शिव पुराण में भी ये प्रसंग आता है कि जब भगवान रूद्र भगवान ब्रह्मा जी कि भौह में से प्रगट हुए तो उन्होंने उनसे मैथुनी सृष्टि बड़ाने को कहा मगर भगवान रूद्र ने यह कहकर इंकार कर दिया कि जीवो के जीवन का आधार दुःख है और मै इस दुखमयी जीवो को उत्पन्न नही करुगा मगर आखिर में उनके दुखो का उद्धार करूंगा. इसीलिये उन्हें रूद्र कहा जाता है.
१५. शिव महा पुराण में ये प्रसंग आता है कि जब भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु उत्पन्न हुए और उनके सामने एक नाद का स्तम्भ प्रगट हुआ. वो दोनों भगवान उसका उत्पति का स्थान जानने के लिए उपर नीचे होते रहे . आखिर में परमात्मा शिव प्रगट हुए और बताया कि वो ही उनके जनक है. उन्होंने ये भी बताया कि वो माया के प्रभाव में अपने पिछले कल्प को भूल चुके है. उन्होंने भगवान ब्रह्मा को सृष्टि रचना और भगवान विष्णु को सृष्टि के संचालन कि जिम्मेदारी दी और बताया कि जल्दी ही भगवान ब्रह्मा की भौहों से भगवान रूद्र उत्पन्न होगे. उन्हें पूर्व कल्पो कि जानकारी होगी और वो सृष्टि का समय आने पर संहार करेंगे. वो देखने में बिलकुल परमात्मा शिव कि तरह होंगे.
१६. परमात्मा शिव को गंगाधर भी कहा जाता है क्योंकि गंगा जब पृथ्वी पर अवतरित हुई तो परमात्मा शिव ने उन्हें अपनी जटाओ में धारण किया था. कहा जाता है कि गंगा का वेग इतना तेज था कि अगर सीधी पृथ्वी पर गिरती तो शायद पृथ्वी शायद उसका वेग न सम्भाल पाती और उसे परमात्मा शिव के इलावा कोई सम्भाल नही पाता . शिवलिंग पर इसलिये जल चढ़ाया जाता है.
१७. परमात्मा शिव को भोले नाथ भी कहा जाता है क्योंकि वो बहुत जल्दी प्रसन्न होते है. एक पिता ही बच्चो कि छोटी सी बात पर प्रसन्न हो जाता है इसीलिये परमात्मा शिव ही इस सृष्टि के जनक है.
१८. परमात्मा शिव के पांच कार्य बताये गये है जो है : प्रथम कार्य है सृष्टि कि रचना जो वो परब्रह्म रूप में करते है दूसरा है पालन जो वो विष्णु रूप में करते है, तीसरा है संहार जो वो रूद्र रूप में करते है, चौथा है तिरोभाव जो कि जड़ शरीर में प्राण डालने का है, ये वो महेश्वर रूप में करते है पांचवा कार्य है अनुराग यानि कि मोक्ष देना जो कि परमात्मा शिव ही कर सकते है.
१९. परमात्मा शिव का एकरूप महाकालेश्वर भी है. इस नाम से एक ज्योतिलिंग उज्जैन में है. महाकालेश्वर का मतलब है काल का भी काल. यानि कब समय का चक्र शुरू होगा और कब खत्म ये सिर्फ परमात्मा शिव ही जानते है.
२०. परमात्मा शिव के तीन नेत्र है. यानी वो तीनो शरीर जड़(शरीर), सूक्ष्म (जीव आत्मा) तथा परलौकिक ( आत्मा) शरीर को देख सकते है तथा वो सृष्टि के तीनो काल भूत, वर्तमान और भविष्य काल को देख सकते है. उनके इलावा किसी और के तीन नेत्र नही है.
२१. परमात्मा शिव की पांच मूर्तिया मानी जाती है : ईशान, महेश्वर, रूद्र, विष्णु, ब्रह्मा. इनमे से ईशान सबसे पवित्र मानी जाती है और इसे ईश्वर भी कहते है और अनुग्रह करने का अधिकार सिर्फ इन्हें ही प्राप्त है.
२२. परमात्मा शिव को विश्वेश्वर भी कहा जाता है. इनका विश्वनाथ नाम का ज्योति लिंग काशी में स्थापित है. सृष्टि के सभी कार्य परमात्मा शिव अपनी पराशक्ति यानि देवी शिवा से ही करवाते है जो कि उनका अटूट हिस्सा है और प्रलय के समय दोनों एक हो जाते है. ऐसा माना जाता है कि जब परमात्मा शिव ने सृष्टि बनाने का विचार किया तब अपने और देवी शिवा के विश्राम के लिए सर्वप्रथम काशी जी कि स्थापना कि थी और जब पृथ्वी बनाई तब उसे उसमे स्थापित कर दिया .
२३. परमात्मा शिव को क्षराक्षर के नाम से भी जाना जाता है. इसका मतलब है क्षर यानि समाप्त होने वाला यानि जड़ शरीर को जानने वाले और अक्षर का मतलब है कभी न खत्म होने वाला यानि आत्मा. परमात्मा शिव दोनों के बारे में जानते है और दोनों के मालिक है इसीलिये वो क्षराक्षर कहलाते है.
२४. उन्हें स्थाणु भी कहा जाता है क्योंकि वो ही स्थाई है बाकी सब खत्म हो जाते है बेशक उनकी उम्र एक दुसरे से ज्यादा होती है.
२५. परमात्मा शिव को शक्तिमान भी कहा जाता है क्योंकि पराशक्ति उनका ही अभिन्न अंग है. इस सृष्टि का हर जीव उन पराशक्ति से शक्ति लेता है और उस शक्ति कि माया से ही घिरा रहता है.
२६. परमात्मा शिव योगियों के ईश्वर है और उन्हें योगेश्वर भी कहा जाता है. और असली योगी वो ही है जो भौतिक संसार से नाता तोडकर सिर्फ परमात्मा से सम्बन्ध बनाने के लिए कोशिश करता है. और वो परमात्मा है शिव.
२७. परमात्मा शिव को नटराज भी कहा जाता है क्योंकि वो ही नृत्य के भगवान है और सृष्टि का अंतिम नृत्य तांडव नृत्य करके वो ही सृष्टि को खत्म करते है.
२८. भगवान ब्रह्मा का चिन्ह कमल है जो कि सृष्टि रचना यानि कि भूत काल का प्रतीक है, भगवान विष्णु का चिन्ह है सुदर्शन चक्र जो कि हमेशा घूमता रहता है यानी कि सृष्टि के संचालन यानि कि वर्तमान का प्रतीक है जबकि परमात्मा शिव का चिन्ह त्रिशूल है जो कि तीनो काल यानि कि भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक है यानि कि परमात्मा शिव ही तीनो काल को जानते है और वो ही उनके मालिक है.
२९. भगवान रूद्र कि शादी जब माता पार्वती से हुई तब देवी पार्वती के पिता हिमालय राज ने भगवान रूद्र के कुल के बारे में जानना चाहा तो देव ऋषि नारद ने उन्हें बताया कि वो ही इस सृष्टि के मालिक है और वो सब को उत्पन्न करते है और कोई उनको पैदा नही करता. वो अजन्मे है. भगवान रूद्र ही परमात्मा शिव का साकार रूप है. इसलिये उनके कुल के बारे में कोई शंका मत रखो.
३०. ये तो आजकल के विज्ञानिक भी मानते है को जो कुछ भी हो रहा है वो प्रकृति कि क्रियाए है और महा शिव पुराण में देवी शक्ति को परमात्मा शिव का ही आधा रूप कहा गया है(अर्धनारीश्वर). इन पराशक्ति को ही माया या प्रकृति कहा गया है . परमात्मा शिव की ही इच्छानुसार ये सारी सृष्टि के कार्य करती है. इस तरह भी ये बात प्रमाणित होती है कि परमात्मा शिव ही इस सृष्टि के मालिक है.
३१. मैथुनी सृष्टि का संचालन काम भावना से होता है. एक बार देवराज इंद्र के कहने पर जब काम देव ने भगवान रूद्र को प्रभावित करने कि कोशिश कि तब उन्होंने काम देव को भस्म कर दिया था. और बाद में सब देवताओ की प्रार्थना पर उन्हें फिर जीवित कर दिया. यानि कि काम उनके सामने टिक नही पाया क्योंकि परमात्मा शिव ने ही उन को बनाया था और वो ही सबके मालिक है.
ऐसी अनगनित बातें और भी है जो ये प्रमाणित करती है कि परमात्मा सिर्फ शिव है और भगवान ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र उनके तीन रूप है. देवी पराशक्ति यानि जगत्जननी यानि प्रकृति यानि माया उनका अभिन्न अटूट अंग है जिनके द्वारा वो सृष्टि के कार्य करते है और प्रलय काल में सब कुछ उनके अंदर समा जाता है.
यह आम धारणा है कि परमात्मा एक है और वह ही सृष्टि चलाता है. उन्हें परमात्मा कहा जाता है क्योंकि वो परम आत्मा है. हमारे शरीर में तीन तरह कि शक्तिया काम करती है. पहली है जड़ शरीर जो कि पञ्च भूत यानि कि आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा मिटटी का बना होता है. हमारा मानव शरीर भी इन पञ्च भूत का बना हुआ है. दूसरी शक्ति इस में रहती है वो है जीव आत्मा. यह आत्मा का ही एक अंश है जो कि माया से लिपटा रहता है तथा यह ही जड़ शरीर का भोग करता है, कर्म करता है और उसके फल पाता है. तीसरी शक्ति है आत्मा जो कि परमात्मा का ही अंश है तथा जो कि देखता रहता है कि जीवात्मा जिसे शरीर दिया गया है वो इसका उपयोग कैसे कर रहा है.
यह तीसरी शक्ति सिर्फ मानव शरीर में पाई जाती है कयोंकि सिर्फ मानव योनी कर्म योनी है बाकि त्रियोस्करता (तिरछा चलने वाला यानि कि पशु पक्षी) तथा जंगम (यानि पेड़ पोधे ) भोग योनी मानी जाती है जिसे कर्म का अधिकार नही है. वो सिर्फ अपने पूर्व जन्मो के कर्मो का फल भुगत सकते है. जैसे कि बिल्ली गाय का दूध नही निकाल सकती मगर सिर्फ पी सकती है. उसी तरह पेड़ पोधे स्वयं खाद नही ले सकते क्योंकि उनकी भोग योनी है. मानव को भगवान ने ये जिमेदारी दी है कि वो भगवान के बताये मार्ग पर चलकर प्रकृति कि व्यवस्था करे. वो बात अलग है कि आज का मानव बजाये प्रकृति से सहयोग करने के उसको जीतने कि कोशिश कर रहा है.
मानव शरीर के अंदर जीव आत्मा और आत्मा दोनों एक साथ शरीर में रहती है मगर अज्ञान तथा माया कि वजह से जीव आत्मा को आत्मा से निकटता महसूस नही होती और वो शरीर के भोग में फंसी रहती है. जब जीव् को आत्मा से निकटता का एहसास हो जाता है तब वो परमात्मा को पहचान कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है. आत्मा से निकटता ही परमात्मा को पाने का रास्ता है. परमात्मा को जानने से पहले हमे सृष्टि कि रचना समझनी होगी. सबसे उपर परमात्मा है फिर त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र है. इनमे से भगवान रूद्र का रूप परमात्मा शिव से बिलकुल मिलता है. इसके बाद सभी देवी देवता आते है जो कि सृष्टि को चलाने में मदद करते है. इन तीनो भगवान जो कि परमात्मा का ही रूप है इनमे से भगवान ब्रह्मा का कार्य सृष्टि कि रचना है, भगवान विष्णु का कार्य सृष्टि का संचालन है तथा भगवान रूद्र का कार्य अंत में सृष्टि का संहार करके उसे परमात्मा में विलीन करने का है. अब हम अपने प्रश्न पर आते है कि "शिव को ही परमात्मा क्यों माना जाये" तो उसके लिए निम्न लिखित कारण है:
१. भगवान ब्रह्माजी का कार्य सृष्टि की रचना है तथा पौराणिक पुस्तको में ब्रह्मा जी के दो रूप बताये गए है एक -अपर ब्रह्मा और दुसरे पर ब्रह्मा. अपर ब्रह्मा सृष्टि को बनाते है और उसके कण कण में व्याप्त है और पर ब्रह्मा उनसे भी परे है. भगवान ब्रह्मा को आमतौर पर ब्राह्मणों, ऋषि मुनियों का अराध्य माना जाता है. अगर भगवान ब्रह्मा ही परमात्मा होते तो दोनों नामो का भेद करने की कोई जरूरत नही थी तथा यह संकेत देता है भगवान ब्रह्मा ने परमात्मा की प्रेरणा से यह सृष्टि बनाई है.
२. भगवान विष्णुजी को सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी दी गयी है और ऐसा माना जाता है की वो देवताओ के अराध्य है और भगवान रूद्र जो की परमात्मा शिव से बिलकुल मिलते जुलते है उन्हें महादेव भी कहा जाता है वो सब के द्वारा पूज्य है चाहे वो देवता हो, मनुष्य हो, असुर हो या दैत्य आदि हो.
३. सृष्टि के संहार का जिम्मा भगवान रूद्र को दिया गया है जो की सबसे मुश्किल कार्य है कि कब सृष्टि चलने लायक नहीं है और उसका अंत होना चाहिये. ऐसा समझा जाता है भगवान रूद्र परमात्मा शिव की कापी है और वो ही परमात्मा शिव के बारे में जानते है (शिव महापुराण). किसी भी चीज को समाप्त करने का फैसला सिर्फ उसका मालिक ही कर सकता है. मगर इसका मतलब ये नहीं है की भगवान ब्रह्मा, विष्णु या रूद्र में कोई छोटा बड़ा है. ऐसा भेद भाव करना भी पाप है और उसके लिए परमात्मा शिव कभी माफ़ नही करते. इसीलिए विभिन्न कल्पो में ये तीनो भगवान एक दुसरे में प्रगट होते है.
४. परमात्मा शिव निराकार और साकार रूप यानि भगवान रूद्र के रूप में साकार रूप में और शिवलिंग के रूप में निराकार रूप में पूजे जाते है. वो निर्विकार भी है कयोंकि उनका किसी योनी विशेष से लगाव या दुर्भाव नही है. वो एक पिता की तरह अपने सब बच्चो से एक सा प्यार करते है और जो भी उनकी पूजा करता है उससे वो प्रसन्न होते है. वो निर्गुण भी है क्योंकि तीनो गुंणों वाले उनकी पूजा करते है जैसे की सात्विक फल, फूल आदि से उनकी पूजा होती है, राजसी मिठाई और पकवान आदि से उनकी पूजा होती है और तामसिक भांग आदि भी उनको अर्पण की जाती है. यानि की तीनो गुंणों के पदार्थ उनकी पूजा के लिए तीनो प्रकृति के लोग अर्पित करके उनकी पूजा कर सकते है. इसलिए वो निराकार , निर्गुण और निर्विकार माने जाते है.
५. परमात्मा शिव भगवान रूद्र रूप में श्मशान में भी उपस्थित रहते है. यह इस बात का संकेत है की परमात्मा शिव के लिए दुनिया के लिए कोई आकर्षण नही है कयोंकि यह सब चीजे उनके कहने पर ही बनाई गयी है ठीक वैसे , जैसे हलवाई को मिठाई का कोई आकर्षण नही होता. उन्होंने सारे शरीर पर भस्म लगाई होती है जो इस बात को बताती है की जीवन का आखरी सत्य मौत है और यह सुंदर जड़ शरीर आखिर राख बन जाना है. इसलिए अपने अंत को याद करके इन्सान को कोई बुरा काम नही करना चाहिये. वैसे भी मरने के बाद आत्मा परमात्मा के पास जाकर जीवात्मा के कर्मो का लेखा जोखा देती है. भगवान रूद्र की श्मशान में उपस्थिति इस बात का संकेत है की मरने के बाद इस सूक्ष्म शरीर के मालिक परमात्मा शिव है. वैसे भी शिव का मतलब है मंगल यानि की भगवान रूद्र की उपस्थिति इस बात का प्रतीक है की श्मशान जैसी जगह भी भगवान को अपवित्र नही कर सकती.
वैसे भी भस्म हिन्दू धर्म में बहुत पवित्र मानी जाती है. भस्म हवन के बाद बचने वाली ज्वलित अवशेषों को भी कहते है और यह अग्नि और सोम(घी) के मिलन से बनती है. हिन्दू धर्म में ये माना जाता है की सम्पूर्ण सृष्टि अग्निशोमात्मक रूप में विद्यमान में है. इसका मतलब सम्पूर्ण पदार्थ अग्नि (तेज) और सोम यानि रस( तरल) के मिलन से बनते है. अग्नि का मतलब है परमात्मा शिव और सोम का मतलब है उनकी पराशक्ति देवी शिवा. भस्म को शिव यानि अग्नि का वीर्य कहा जाता है. कुछ लोग कह सकते है की पानी और अग्नि (तेज) तो एक दूसरे के बिलकुल विपरीत है. यह बात सही नहीं है क्योंकि अब तो आजकल के विज्ञानिक भी मानते है की जल से बिजली यानि तेज उत्पन्न किया जा सकता है. यानि की ये दोनों एक दुसरे से अभिन्न है. इसीलिये सिर्फ सोम(देवी शिवा) ही अपने पानी के रूप में अग्नि (परमात्मा शिव) को शांत कर सकता है और घी के रूप में उसे भड़का सकता है.
६. भगवान रूद्र के गले में पड़ा सांप इस बात को बताता है की इन्सान की इन्द्रिया सांप की तरह है जिनको अगर वश में रखा जाये तो ज्ञान देती है और रक्षा करती है और अगर खुला छोड़ दिया जाये तो सांप की तरह जीवन में जहर घोल देती है. इस लिए इन्सान को अपनी इन्द्रियों पर वश रखना चहिये.
७. परमात्मा शिव को देवादिदेव महादेव कहा जाता है क्योंकि वो देवताओ के भी देवता है और उन्हें वर देने और कार्य करने की शक्ति प्रदान करते है इसलिए वो ही परमात्मा है.
८. परमात्मा शिव का एक रूप पशुपति नाथ का भी है. इसको समझने से पहले समझना होगा की पशु कौन है. हर वो प्राणी जो चेतन है वो पशु है चाहे वो मनुष्य हो, देवता हो, पेड़ हो, पोधे हो, यानि देवताओ से लेकर और सूक्ष्मतर प्राणी तक हर जीव पशु है जो की पाशो यानि विकारो से बंधा हुआ है. यह विकार या पाश जीव के अंदर अहंकार को जन्म देते है. वो अहंकार जीव को अपने असली स्वरूप यानि परमात्मा के अंश आत्मा से अलग होकर एक अलग पहचान होने का भ्रम पैदा करता है. इसी भ्रम के अधीन जीव को जड़ शरीर से लगाव पैदा होता है. भोग योनी के जीव सिर्फ वो ज्ञान रखते है जो उन्हें भोगना होता है. जबकि कर्म योनी यानि मनुष्य जन्म से थोडा ज्ञान और थोड़े संस्कार और थोडा प्रारब्द लेकर पैदा होता है. जैसे के जन्म के समय से ही उसे ज्ञात होता है की भूख लगने पर उसे रोना है हसना नही. इसी तरह कोई बच्चा थोड़ी भूख लगने पर ही चिल्लाने लगता है और कोई शांत स्वभाव का होता है. यह उसके संस्कार है. किसी की माता दयालु होती है और कोई नौकरानी को सौंप दिया जाता है ये प्रारब्ध है. इन तीनो में से ज्ञान तो कुछ खुद बडाना पड़ता है और कुछ इन्द्रियों के क्षमता बड़ने से बड़ता है. बाकि दोनों साथ ही चलते है तथा क्रियमण कर्मो से भी प्रभावित होते है. ये पाश जीव पर माया के जरिये डाले जाते है.
तो इस तरह हर जीव पाशो से बंधा पशु है और जब भी कोई वस्तु होती है तो उसका कोई पति यानि मालिक होता है और वो पति यानि परमात्मा शिव ही पशुपति नाथ यानि की सब पशुओ के मालिक कहलाते है और उनका इस नाम से बहुत प्रसिद्ध मन्दिर पशुपति नाथ मन्दिर नेपाल में स्थित है. परमात्मा शिव ही सब पशुओ यानि जीवो के मालिक है और वो अपनी पराशक्ति यानि माया यानि जगत्जननी यानि प्रकृति यानि देवी शिवा के जरिये इस सृष्टि के कार्य करते है. शिव और शक्ति एक है और उन्हें अलग करके नही देखा जा सकता इसलिए परमात्मा शिव को अर्धनारीश्वर रूप में भी पूजा जाता है.
९. ये माना जाता है कि इस कल्प में जब परमात्मा ने सृष्टि रचना का सोचा तो नीर यानि पानी में से भगवान विष्णु, कमल के फूल की नाल में से भगवान ब्रह्मा तथा उनकी भौंह में से भगवान रूद्र जो कि परमात्मा शिव का साकार प्रतिरूप है वो पैदा हुए. अलग अलग कल्प में परमात्मा के ये तीनो रुपी भगवान अलग अलग तरह से उत्पन्न होते है मगर ये जन्म तो लेते है. मगर परमात्मा शिव का कहीं पैदा होने का कोई उल्लेख नही मिलता. इसलीये परमात्मा शिव अजन्मे माने गए है और वो ही परमात्मा है.
१०. 'सत्यम शिवम सुन्दरम' इस श्लोक से हर हिन्दू वाकिफ है. इसका मतलब है सृष्टि का पहला और अंतिम सत्य परमात्मा शिव है वैसे भी शिव का मतलब है मंगल. इसलिए सृष्टि की शुरआत परमात्मा शिव से होती है और अंत में सब कुछ उनमे विलीन हो जाता है. भगवान ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र उनके तीन साकार रूप है. उसके बाद, देवता, गंधर्व, मनुष्य, स्थावर तथा जंगम इत्यादि योनिया. इसीलिये कहते है कि संसार में सिर्फ सत्य और शिव सुंदर है.
११. हालाँकि परमात्मा शिव को हजार से अधिक नमो से पुकारा जाता है उनमे से ८ मुख्य है : शिव, महेश्वर, रूद्र, ब्रह्मा, विष्णु, सर्ववैद्य, सर्वज्ञ, परमात्मा. क्योंकि परमात्मा शिव की शक्ति माया है और वो उसके पति है यानि माया के भी इश्वर है इसलिए उन्हें महेश्वर कहा जाता है. उन्हें सर्ववैध भी कहा जाता है क्योंकि वो इस सृष्टि की हर बात से वाकिफ है और वो ही इस सृष्टि के सभी रोग दूर करने में समर्थ है. उन्हें सर्वज्ञ कहा गया है क्योंकि वो हर जगह मौजूद है.
१२. उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है क्योंकि सागर मंथन के समय उन्होंने सृष्टि को बचाने के लिए विष को अपने गले में रख लिया था. इससे हमे ये संकेत मिलता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ा तो उसके मालिक ने उसे बचाने के लिए विष भी पी लिया और इसी तरह मानवता कि रक्षा के लिए इन्सान को विष पीने से भी नही घबराना चाहिये.
१३. जब भी सृष्टि कि विभिन्न योनियों में मतभेद होते है और उनका फैसला नही हो पाता तो वो अंत में परमात्मा शिव के पास जाते है और उनका फैसला ही अंतिम फैसला माना जाता है. यह स्पष्ट करता है कि वो ही परमात्मा है.
१४. जीवन का सत्य है दुःख. जीव अपने कर्मो से और उसके भोग से सदा दुखी रहता है. सुख भोगते हुए भी उन सुखो के खो जाने के भय से वो दुखी रहता है. जीवन के इस रुदन को जो दूर कर सके वो रूद्र है. महा शिव पुराण में भी ये प्रसंग आता है कि जब भगवान रूद्र भगवान ब्रह्मा जी कि भौह में से प्रगट हुए तो उन्होंने उनसे मैथुनी सृष्टि बड़ाने को कहा मगर भगवान रूद्र ने यह कहकर इंकार कर दिया कि जीवो के जीवन का आधार दुःख है और मै इस दुखमयी जीवो को उत्पन्न नही करुगा मगर आखिर में उनके दुखो का उद्धार करूंगा. इसीलिये उन्हें रूद्र कहा जाता है.
१५. शिव महा पुराण में ये प्रसंग आता है कि जब भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु उत्पन्न हुए और उनके सामने एक नाद का स्तम्भ प्रगट हुआ. वो दोनों भगवान उसका उत्पति का स्थान जानने के लिए उपर नीचे होते रहे . आखिर में परमात्मा शिव प्रगट हुए और बताया कि वो ही उनके जनक है. उन्होंने ये भी बताया कि वो माया के प्रभाव में अपने पिछले कल्प को भूल चुके है. उन्होंने भगवान ब्रह्मा को सृष्टि रचना और भगवान विष्णु को सृष्टि के संचालन कि जिम्मेदारी दी और बताया कि जल्दी ही भगवान ब्रह्मा की भौहों से भगवान रूद्र उत्पन्न होगे. उन्हें पूर्व कल्पो कि जानकारी होगी और वो सृष्टि का समय आने पर संहार करेंगे. वो देखने में बिलकुल परमात्मा शिव कि तरह होंगे.
१६. परमात्मा शिव को गंगाधर भी कहा जाता है क्योंकि गंगा जब पृथ्वी पर अवतरित हुई तो परमात्मा शिव ने उन्हें अपनी जटाओ में धारण किया था. कहा जाता है कि गंगा का वेग इतना तेज था कि अगर सीधी पृथ्वी पर गिरती तो शायद पृथ्वी शायद उसका वेग न सम्भाल पाती और उसे परमात्मा शिव के इलावा कोई सम्भाल नही पाता . शिवलिंग पर इसलिये जल चढ़ाया जाता है.
१७. परमात्मा शिव को भोले नाथ भी कहा जाता है क्योंकि वो बहुत जल्दी प्रसन्न होते है. एक पिता ही बच्चो कि छोटी सी बात पर प्रसन्न हो जाता है इसीलिये परमात्मा शिव ही इस सृष्टि के जनक है.
१८. परमात्मा शिव के पांच कार्य बताये गये है जो है : प्रथम कार्य है सृष्टि कि रचना जो वो परब्रह्म रूप में करते है दूसरा है पालन जो वो विष्णु रूप में करते है, तीसरा है संहार जो वो रूद्र रूप में करते है, चौथा है तिरोभाव जो कि जड़ शरीर में प्राण डालने का है, ये वो महेश्वर रूप में करते है पांचवा कार्य है अनुराग यानि कि मोक्ष देना जो कि परमात्मा शिव ही कर सकते है.
१९. परमात्मा शिव का एकरूप महाकालेश्वर भी है. इस नाम से एक ज्योतिलिंग उज्जैन में है. महाकालेश्वर का मतलब है काल का भी काल. यानि कब समय का चक्र शुरू होगा और कब खत्म ये सिर्फ परमात्मा शिव ही जानते है.
२०. परमात्मा शिव के तीन नेत्र है. यानी वो तीनो शरीर जड़(शरीर), सूक्ष्म (जीव आत्मा) तथा परलौकिक ( आत्मा) शरीर को देख सकते है तथा वो सृष्टि के तीनो काल भूत, वर्तमान और भविष्य काल को देख सकते है. उनके इलावा किसी और के तीन नेत्र नही है.
२१. परमात्मा शिव की पांच मूर्तिया मानी जाती है : ईशान, महेश्वर, रूद्र, विष्णु, ब्रह्मा. इनमे से ईशान सबसे पवित्र मानी जाती है और इसे ईश्वर भी कहते है और अनुग्रह करने का अधिकार सिर्फ इन्हें ही प्राप्त है.
२२. परमात्मा शिव को विश्वेश्वर भी कहा जाता है. इनका विश्वनाथ नाम का ज्योति लिंग काशी में स्थापित है. सृष्टि के सभी कार्य परमात्मा शिव अपनी पराशक्ति यानि देवी शिवा से ही करवाते है जो कि उनका अटूट हिस्सा है और प्रलय के समय दोनों एक हो जाते है. ऐसा माना जाता है कि जब परमात्मा शिव ने सृष्टि बनाने का विचार किया तब अपने और देवी शिवा के विश्राम के लिए सर्वप्रथम काशी जी कि स्थापना कि थी और जब पृथ्वी बनाई तब उसे उसमे स्थापित कर दिया .
२३. परमात्मा शिव को क्षराक्षर के नाम से भी जाना जाता है. इसका मतलब है क्षर यानि समाप्त होने वाला यानि जड़ शरीर को जानने वाले और अक्षर का मतलब है कभी न खत्म होने वाला यानि आत्मा. परमात्मा शिव दोनों के बारे में जानते है और दोनों के मालिक है इसीलिये वो क्षराक्षर कहलाते है.
२४. उन्हें स्थाणु भी कहा जाता है क्योंकि वो ही स्थाई है बाकी सब खत्म हो जाते है बेशक उनकी उम्र एक दुसरे से ज्यादा होती है.
२५. परमात्मा शिव को शक्तिमान भी कहा जाता है क्योंकि पराशक्ति उनका ही अभिन्न अंग है. इस सृष्टि का हर जीव उन पराशक्ति से शक्ति लेता है और उस शक्ति कि माया से ही घिरा रहता है.
२६. परमात्मा शिव योगियों के ईश्वर है और उन्हें योगेश्वर भी कहा जाता है. और असली योगी वो ही है जो भौतिक संसार से नाता तोडकर सिर्फ परमात्मा से सम्बन्ध बनाने के लिए कोशिश करता है. और वो परमात्मा है शिव.
२७. परमात्मा शिव को नटराज भी कहा जाता है क्योंकि वो ही नृत्य के भगवान है और सृष्टि का अंतिम नृत्य तांडव नृत्य करके वो ही सृष्टि को खत्म करते है.
२८. भगवान ब्रह्मा का चिन्ह कमल है जो कि सृष्टि रचना यानि कि भूत काल का प्रतीक है, भगवान विष्णु का चिन्ह है सुदर्शन चक्र जो कि हमेशा घूमता रहता है यानी कि सृष्टि के संचालन यानि कि वर्तमान का प्रतीक है जबकि परमात्मा शिव का चिन्ह त्रिशूल है जो कि तीनो काल यानि कि भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक है यानि कि परमात्मा शिव ही तीनो काल को जानते है और वो ही उनके मालिक है.
२९. भगवान रूद्र कि शादी जब माता पार्वती से हुई तब देवी पार्वती के पिता हिमालय राज ने भगवान रूद्र के कुल के बारे में जानना चाहा तो देव ऋषि नारद ने उन्हें बताया कि वो ही इस सृष्टि के मालिक है और वो सब को उत्पन्न करते है और कोई उनको पैदा नही करता. वो अजन्मे है. भगवान रूद्र ही परमात्मा शिव का साकार रूप है. इसलिये उनके कुल के बारे में कोई शंका मत रखो.
३०. ये तो आजकल के विज्ञानिक भी मानते है को जो कुछ भी हो रहा है वो प्रकृति कि क्रियाए है और महा शिव पुराण में देवी शक्ति को परमात्मा शिव का ही आधा रूप कहा गया है(अर्धनारीश्वर). इन पराशक्ति को ही माया या प्रकृति कहा गया है . परमात्मा शिव की ही इच्छानुसार ये सारी सृष्टि के कार्य करती है. इस तरह भी ये बात प्रमाणित होती है कि परमात्मा शिव ही इस सृष्टि के मालिक है.
३१. मैथुनी सृष्टि का संचालन काम भावना से होता है. एक बार देवराज इंद्र के कहने पर जब काम देव ने भगवान रूद्र को प्रभावित करने कि कोशिश कि तब उन्होंने काम देव को भस्म कर दिया था. और बाद में सब देवताओ की प्रार्थना पर उन्हें फिर जीवित कर दिया. यानि कि काम उनके सामने टिक नही पाया क्योंकि परमात्मा शिव ने ही उन को बनाया था और वो ही सबके मालिक है.
ऐसी अनगनित बातें और भी है जो ये प्रमाणित करती है कि परमात्मा सिर्फ शिव है और भगवान ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र उनके तीन रूप है. देवी पराशक्ति यानि जगत्जननी यानि प्रकृति यानि माया उनका अभिन्न अटूट अंग है जिनके द्वारा वो सृष्टि के कार्य करते है और प्रलय काल में सब कुछ उनके अंदर समा जाता है.
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